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Shodh Chintan Patrika

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Peer reviewed research journal; ISSN: 2583-1860

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1. ‘कागज की नाव’ में बिहारी समाज के कुछ सुलगते अनसुलझे सवाल

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2. तमिल संगम कविता पर एक दृष्टि : कुरुंतोकै के विशेषसंदर्भ में

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3. पूर्वोत्तर की हिंदी-अनूदित कहानियों में विषय-वैविध्य

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4. अज्ञेय के उपन्यासों में चित्रित नारी की मन:स्थिति

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5. यायावर की सजलों में नवगीत के तत्व

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6. हिंदी एवं नेपाली कहानियों का तुलनात्मक अध्ययन

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7. हिंदी कथा साहित्य में ‘गे काउंटरकल्चर’ की खंडित परंपरा दृश्यता और संघर्ष

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संपादकीय

          जन-मन की अभिलाषा

अभिलाषा प्राणीमात्र की जन्मजात प्रवृत्ति होती है। इन्हीं अभिलाषाओं के चलते जिंदगी आगे बढ़ती है। पाने न पाने का सुख-दुख जीवन का अभिन्न अंग होता है,पर अभिलाषा का कभी अंत नहीं होता है। अभिलाषा की परिधि मनुष्य विशेष पर निर्भर करता है। अपनी सोच और सामर्थ्य के आधार पर अभिलाषाओं की सीमा निर्धारित होती है।

पिछले वर्ष (सन् 2024 ई.) सम्पन्न हुए भारत की लोकसभा का चुनाव मानो भारतीय लोगों की अभिलाषा के बारे में बहुत कुछ कह गया।पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने भारतीय संविधान के द्वारा दिये गए मानव के अधिकारों-रोटी,कपड़ा और मकान को देने का प्रयास किया है। एक सौ चालीस करोड़ की आबादी के इस देश की गरीबी सीमा के नीचे रह रहे लोगों को जीने के अधिकारों के प्रति सजगता दिखाकर विविध राजनीतिक दलों ने चुनाव घोषणा पत्र में तरह-तरह की सुविधा देने का वचन दिया । आम जन को गरीबी सीमारेखा से ऊपर ले जाने के स्वप्न को वास्तव में तब्दील करने के प्रयास के रूप में केन्द्रीय सरकार की ओर से भारत के लाखों परिवारों के लिए आवास,शौचालय,घरेलू गैस आदि का प्रावधान किया गया ; दीदियों को लखपति दीदी बनाया गया ; व्यापार के लिए धन दिया गया; मुफ्त की शिक्षा; विद्यार्थियों के स्कूल ड्रेस, साइकिल, स्कूटी, कंप्यूटर आदि जो जनगण के जीवन स्तर को एक स्तर तक ले गया। इनके अलावा भी ‘तलाक’ जैसी प्रथा की समाप्ति कर मुसलमान महिलाओं के जीवन को भी सुरक्षा दी गयी । ऐसी उपलब्धियों से जन के मन में अभिलाषाओं की उड़ान और तेज हो गयी।

अभिलाषा कमल नाल की तरह होती है,बढ़ना तो जानती है,पर घटना नहीं जानती। खाद्य, आवास आदि प्राप्त सुविधाएँ उनके अधिकार के साथ स्वभाव का भी हिस्सा बन गईं। आज देश में जो आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग हैं, वे हर साल कर  के रूप में सरकार को अच्छी रकम अदा करते हैं। इसके विपरीत आर्थिक दुरावस्था के कारण ही देश की अधिकांश जनता को सरकारी सुविधाएँ मिल रही हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में साधारण जन का ध्यान देश की सुरक्षा,विकास,रक्षा,वैदेशिक संबंध आदि विषयों पर न जाकर मासिक धन की गारंटी पर पड़ी,जिसका प्रमाण देश के मतदातओं ने चुनाव परिणाम के तुरंत बाद धन लाने की भीड़ लगाकर दिखा दिया। इस देश के जन के मन में मुफ्त के धन की अपार अभिलाषा ने चुनाव के परिणाम पर बड़ा प्रभाव डाला है।

भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा था कि देश की जनता को शिक्षा और स्वास्थ्य के सिवा कुछ भी चीजें मुफ्त में नहीं दी जानी चाहिए,इससे उसका स्वभाव बिगड़ता है। क्या इसी की छवि इस चुनाव में देखी गयी है? लोग अपने अधिकारों के प्रति बड़े सजग हैं,अच्छी बात है,होना ही चाहिए। पर एक ही समय वे अपनी जिम्मेदारियों को लेकर उपेक्षा की भावना रखते हैं। अधिकार और ज़िम्मेदारी को एक दूसरे से अनिवार्य रूप से जुड़े रखने की जरूरत है। प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ सामर्थ्य होता है। सरकारी सुविधाओं के बदले में उनसे सरकार को अपने सामर्थ्य के अनुरूप देश के लिए कुछ न कुछ सेवा उपलब्ध करवाने के विषय पर गंभीरता से सोच-विचार करने की जरूरत है। देश की सामग्रिक प्रगति के लिए हर स्तर के लोगों का  सहयोग आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। जब परिवार का एक भाई उपार्जन करता है और दूसरा नहीं , तब परिवार में अशांति का वातावरण पनपता है और परिवार के विघटन की नींव पड़ती है। भारतवर्ष में सदियों से चले आये संयुक्त परिवार के टूटने के प्रमुख कारणों में आर्थिक उपार्जन के वैषम्य भी रहा है। अब हमारे देश में हितधारकों की संख्या बढ़ती आबादी की गति के साथ तेजी से बढ़ रही है। जो लोग कड़ी मेहनत करते हैं उनके कर के पैसों से उन लोगों के जीवन की आवश्यकताओं का निदान हो रहा है, जो श्रम नहीं करते या श्रम करने की क्षमता और कौशल नहीं रखते। इससे करदाताओं के मन में एक असंतुष्टि का भाव भी पैदा होता है। कई तीस प्रतिशत तक इसीलिए कर देता है क्यों कि वह  अच्छी तरह से उपार्जन करने में सक्षम है।

आखिर कब तक सरकारें मुफ्त में इन लोगों को ये तमाम सुविधाएँ देती रहेंगी यह विचारणीय प्रश्न  है। आर्थिक रूप से समृद्ध व्यक्ति को अपने उपार्जन का लगभग एक तिहाई  देशहित में देना पड़ता है, तो आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति भी देश के लिए कुछ तो अवश्य करे, चाहे वह न्यूनतम ही क्यों न हो। क्योंकि उन्हें भी देश के नागरिक होने के नाते तमाम सुविधाएँ मिलती हैं। देश की प्रगति एक वर्ग विशेष की ज़िम्मेदारी नहीं हो सकती। इस महान यज्ञ में सबके सहयोग की आवश्यकता है। वैयक्तिक अभिलाषाओं के अतिरिक्त एक अभिलाषा देश के लिए भी हो कि इस महान देश को महानतम बनाने में हम सब का साथ हो।

 

डॉ. रीतामणि वैश्य

संपादक

शोध-चिंतन पत्रिका

वर्तमान अंक

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Publishing Body: NEGLIMPSE

Address: House No.: 102 (B)

Ganesh Nagar, Bashistha, Guwahati

Near the Ganesh Nagar Child School

Post Office: Bashistha, PIN:781029

Kamrup(M), Assam

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